शराब के सहारे उत्तराखंड और सरकार
“ प्रदेश में किसी भी दल की सरकार रही हो, सभी का आबकारी नीति या कहे शराब नीति को लेकर कथनी और करनी में अंतर रहा है, शराब की दुकानों के पक्ष में अप्रत्यक्ष रूप से बदलते कानून व नियम जिसका प्रमाण देते है क्योकि कही न कही शराब से आने वाली घोषित और अघोषित आय के लालच ने सरकारों का झुकाव हमेशा शराब नीति को और सहज बनाने में रहा है ”
EDITORIAL
Hem Purohit
10/2/20251 min read


प्रदेश में राजस्व का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत बन चूका आबकारी विभाग का सरकारी संरक्षण ये दर्शाता है की कही न कही मदिरा प्रधान बनते इस प्रदेश में सरकारे और प्रशासन अपने अर्थ लोभ साधने के लिए किसी भी कीमत पर जा सकती है चाहे “योग और धर्मनगरी ऋषिकेश में जनाक्रोश के बीच पुलिस सुरक्षा में शराब की बिक्री हो या फिर डेनिस का कुछ समय तक चला एकाधिकार” .
जहाँ प्रदेश में पहले जगह जगह दिखते मंदिर और धर्मस्थलो की वजह उत्तराखंड को देवभूमि के रूप में पहचाना जाता था वही अब हर सड़क हर मोहोले में खुली शराब की दुकानों के कारण इस प्रदेश को भविष्य में शराब प्रदेश के रूप में पहचान मिलाने लगे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी…….2025-26 की आवकारी नीति की बात करे जिसका मुख्य उदेश्य राजस्व में वृद्धि, धार्मिक संवेदनाओ के प्रति सम्मान ,स्थानीय उद्योगों और कृषि को बढ़ावा देना है. जो कही न कही प्रदेश के विकाश को आबकारी नीति पर केन्द्रित करती है, जो की प्रदेश में आर्थिक सम्प्पनाता के लिए सरकार का एक दूरगामी कदम लगता है,अपितु शराब की दुकानों के खिलाफ जनाक्रोश इस नीति के खिलाफ अपना विरोध दर्ज करता है.
खराश्रोत में हुई अजेन्द की हत्या के बाद ऋषिकेश में शराब बिक्री के विरुद्ध जारी आन्दोलन के बीच कई सवाल खड़े होते है जहा आंदोलनकारियो ने आरोप लगाया है की कैसे वन भूमि को राजस्व भूमि बता कर शराब की दुकान के लिए जगह देदी गयी, वही यह ठेका सरकार की मंशा और आबकारी नीति का ठेके से आते राजस्व के प्रति झुकाव दिखता है , नयी आबकारी नीति की माने तो किसी भी धार्मिक नगरी के नगर निकाय की सात किलोमीटर की सीमा में कोई भी शराब की दुकान नहीं खोली जा सकती लेकिन गंगा तट से 1 किलोमीटर दूर खुले इस ठेके को देख ऐसा लगता है की ये नियमावली बस इसी को देखते हुए बनायीं गयी हो. क्योकि कही न कही अगर जिला परिसीमन को हटा दिया जाये तो इस दुकान की दुरी ऋषिकेश नगर पालिका कार्यालय से सिर्फ साढ़े तीन किलोमीटर दूर है, जो जाहिर तौर पे शहर का हिस्सा माना जा सकता है. लेकिन यह क़ानूनी रूप से धर्मनगरी ऋषिकेश का हिस्सा नहीं है.इस ठेके से सरकार का लगाव ऐसा है की इसके पक्ष में विधानसभा में मंत्री सुवोध उनियाल कहते है की
“ ऋषिकेश क्षेत्र में शराब की दुकानो के न होने की वजह से यहाँ के लोगो को रायवाला और रानीपोखरी जाना पड़ता था जिसकी वजह से कई परिवारों ने अपना एकलोता बेटा रोड दुर्घटना में खो दिए, यह तर्क उनके द्वारा खरास्रोत में ठेके विवाद पर दिया गया, जो उत्तराखंड के युवाओ और परिवारों के लिए उनकी पीड़ा और जिम्मेदारी का एहसास सा लगता है मगर स्वस्थ सुविधाओ की कमी के चलते मरने वालो की संख्या शायद उनकी जिम्मेदारी और पीड़ा के दायरे में नहीं आती.
ये कोई पहला मामला नहीं है जहाँ ऋषिकेश में खुले इस ठेके पर विवाद हुआ हो, पहले भी ट्रक में शराब की दुकान सञ्चालन के मामले में इसे जनाक्रोश का सामना करना पड़ा था, लेकिन धर्म नगरी ऋषिकेश को पर्यटन और भोग नगरी बनाने में तुली सरकारो का समर्थन इस ठेके को अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष रूप से मिलता रहा है.
उत्तराखंड की सरकारों का ये शराब प्रेम सिर्फ वर्त्तमान सरकार में ही नहीं दिखता, वो तब भी दिखा जब हरीश रावत की कांग्रेस सरकार ने शराब वितरण का काम उत्तराखंड मंडी परिषद को ये तर्क देते हुए सौपा की इससे शराब सिंडिकेटों के एकाधिकार पर लगाम लगेगी लेकिन हुआ उलट जहाँ इस फैसले के बाद डेनिस नाम के शराब ब्रांड का एकाधिकार प्रदेश में दिखने लगा, वही जब सुप्रीमकोर्ट के आदेश के बाद देश भर में राष्ट्रिय राजमार्गो के 500 मीटर की सीमा में आने वाली शराब की दुकानों को हटाया जाना था तभी 2017 में त्रिवेंद्र सिंह रावत की भाजपा सरकार ने 64 राजमार्गों को "जिला सड़कें" में तब्दील कर दिया। इस घोषणा से लगभग 150 से अधिक शराब की दुकानों को दोबारा क़ानूनी संरक्षण मिला और ये सुप्रीमकोर्ट के आदेश के दायरे से बहार हो गई। सरकार का अनुमान था कि इस चाल से 600 करोड़ रुपये का संभावित नुकसान रोका जा सकता है ।
सरकारें जनता से धर्म और स्वास्थ्य की बातें करती हैं, लेकिन व्यवहार में शराब दुकानों के खुलने में हर बाधा को दूर करने का प्रयास करती हैं। 25 साल में आबकारी राजस्व में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है - 2000-01 में यह मात्र 17.54 करोड़ रुपये थी जो 2024-25 में बढ़कर 4,439 करोड़ रुपये हो गई है, और 2025-26 में इसका लक्ष्य 5,060 करोड़ रुपये रखा गया है। यह लगभग 288 गुना की वृद्धि है - एक ऐसी वृद्धि जो किसी संतुलित विकास की कहानी नहीं बल्कि अर्थलोभ की कहानी बताती है।
हरीश रावत सरकार और डेनिस शराब का विवाद 2014 में सामने आया था, जब डेनिस नामक शराब ब्रांड को बाजार में लाया गया। उस समय हरीश रावत की सरकार पर आरोप लगे कि उन्होंने अन्य शराब ब्रांडों को छोड़कर डेनिस ब्रांड को प्रमोट किया, जिससे शराब कंपनियों और वितरकों के बीच राजनीतिक और व्यावसायिक विवाद बढ़ा।विशेष रूप से, कहा गया कि उत्तराखंड मंडी परिषद को शराब वितरण का कार्य सौंपा गया था, जिसे राज्य सरकार ने विभिन्न शराब सिंडिकेटों के एकाधिकार को तोड़ने के लिए किया था, लेकिन वास्तव में यह एक विशेष कंपनी (डेनिस के उत्पादक Rock & Storm Distilleries Pvt Limited) को लाभ पहुंचाने के लिए था। इस निर्णय से अन्य शराब कंपनियों और वितरकों के व्यापार में भारी गिरावट आई, जिससे उन्होंने उच्च न्यायालय का रुख किया। उच्च न्यायालय ने भी सरकार को आदेश दिया कि बिक्री के आंकड़ों के आधार पर सभी ब्रांडों के ऑर्डर जारी करें, परन्तु आदेश का पालन ठीक से नहीं हुआ।यह विवाद इतना बढ़ा कि डेनिस ब्रांड के प्रोत्साहन को लेकर राजनीतिक संकट भी सामने आया और कहा गया कि शराब माफिया और प्रतिस्पर्धी कंपनियाँ इस मामले में राजनीतिक सौदेबाजी और साजिशों में शामिल थीं। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भाजपा सरकार पर भी इस मुद्दे को लेकर तीखा हमला किया और इसे राजनीतिक साजिश बताया। इस प्रकार, डेनिस शराब विवाद उत्तराखंड में शराब नीति, सरकारी हस्तक्षेप और राजनीतिक विद्वेष के बीच एक जटिल मामला बन गया था, जिसमें शराब बाजार का शेयर, वितरण और सरकार के रवैये को लेकर भारी विवाद हुआ था.
स्वास्थ्य, सामाजिक तानों-बानों और वास्तविकता पर असर
2019 में उत्तराखंड में रुड़की में नकली शराब से 32 लोगों की मौत हुई थी, और हरिद्वार के बालूपुर गांव में 34 लोग मारे गए थे। सरकार ने आंखें मूंद लीं। 2016 से लेकर 2023 तक आबकारी विभाग पर सरकार की पकड़ तो बढ़ती गई, लेकिन शराब से संबंधित मौतों, मानसिक रोगों और पारिवारिक विघटन पर कोई ध्यान नहीं दिया गया .
उत्तराखंड में 0.3 प्रतिशत महिलाएं और 25.5 प्रतिशत पुरुष शराब का सेवन करते हैं। शराब और नशीली दवाओं का उपयोग अब 3.9 प्रतिशत विकलांगता का कारण बन गया है। लेकिन सरकार की प्राथमिकता ये जांच नहीं है कि इससे कितने परिवार टूट रहे हैं - सरकार की प्राथमिकता है आगामी साल 5,060 करोड़ के लक्ष्य को पूरा करना।
2024-25 के बजट में आबकारी विभाग को "दूसरा सबसे बड़ा राजस्व स्रोत" माना गया है। राज्य की अपनी कर राजस्व में से 22,509 करोड़ रुपये का अनुमान है, जिसमें से 4,439 करोड़ रुपये केवल आबकारी विभाग से आता है। इसका मतलब है कि कुल अपने कर राजस्व का लगभग 20% हिस्सा शराब से आ रहा है। यह एक खतरनाक निर्भरता है। जब राजस्व इतना महत्वपूर्ण हो जाता है, तो सरकार की नीतियां राजस्व संग्रह के इर्द-गिर्द घूमने लगती हैं, न कि जनता के कल्याण के इर्द-गिर्द। 2025-26 के लिए सरकार ने राजस्व का लक्ष्य 5,060 करोड़ रुपये रखा है, जो पिछले साल से 14% अधिक है।
उत्तराखंड के पास खनिज संसाधन, वन संपदा, जल शक्ति, पर्यटन और कृषि-आधारित उद्योग हैं। इन क्षेत्रों में निवेश करके क्या टिकाऊ और नैतिक राजस्व नहीं बनाया जा सकता? पनबिजली से उत्पन्न ऊर्जा क्यों न बेची जाए? ऑर्गेनिक खेती और जैव-विविधता से जुड़े उद्योगों को क्यों न प्रोत्साहित किया जाए? शिक्षा, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक पर्यटन में क्यों न विनिवेश किया जाए?
भारत का संविधान अनुच्छेद 47 में कहता है कि राज्य नागरिकों के स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए प्रयास करेगा। लेकिन उत्तराखंड की सरकारें इसे भूल गई हैं। अजेंद्र की मौत, खरास्रोत के ऊपर उठी आवाजें, और सुप्रीमकोर्ट के आदेश को चुपके से तोड़ने की कवायद - ये सब साथ मिलकर एक गंभीर संदेश देते हैं: उत्तराखंड एक मोड़ पर है। क्या यह देवभूमि रहेगी या शराब-प्रदेश बन जाएगी,
ये मानना भी बहुत जरुरी है की प्रदेश को सुचारू रूप से चलाने के लिए आबकारी का राजस्व योगदान अदुतीय है और सरकारों के प्रयाश इसमे और वृद्धि करना है जिससे प्रदेश के विकाश के लिए पर्याप्त धन राजकोष में जमा हो पाए लेकिन कही न कही उत्तराखंड को समांतर रूप से नए रस्ते तलासने चाहिये जिससे की भविष्य में शराब पर निर्भरता कम की जा सके आबकारी राजस्व 5,060 करोड़ से बढ़ाकर 7,000 करोड़ तक ले जाने की जगह, क्या सरकार पर्यटन, हिमालयी कृषि, जल संरक्षण और स्वच्छ उर्जा से वैकल्पिक राजस्व संरचना बना सकती है? यह सवाल जरूरी है क्योंकि टिकाऊ विकास वह है जो पीढ़ियों को संपन्न बनाता है, न कि आज के युवाओं को खत्म करता है।
आशा यह है कि सरकार अपनी प्राथमिकताओं पर ध्यान दे। राजस्व जरूरी है, लेकिन राजस्व से भी अधिक जरूरी है राज्य के युवाओं की सुरक्षा, परिवारों का सुख, और उत्तराखंड की पवित्र छवि। यदि सरकार इसे समझ सके, तो बदलाव संभव है.
उत्तराखंड प्रदेश में शराब सेवन से होने वाली मृत्यु एक मौन आपातकाल है:
3,000-4,000 वार्षिक मृत्यु अनुमानित (सीधे शराब से संबंधित)
पुरुषों में 63 प्रति 100,000 की राष्ट्रीय दर (महिलाओं में 13.5)
लीवर सिरोसिस में 58.4% मामले शराब के कारण (उत्तराखंड में)
2019, 2022, 2025 में नकली शराब त्रासदियां दिखाती हैं कि नियंत्रण विफल है
भविष्य में 36.7% की वृद्धि प्रजेक्टेड है (2019-2030 में)